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From Script to Screen: The Complete Guide to Filmmaking

स्क्रिप्ट से स्क्रीन तक: भारतीय सिनेमा के सबसे प्रभावशाली निर्देशकों की यात्रा 

  1. परिचय: बॉलीवुड फिल्ममेकिंग का जादू
  2. फ़िल्म निर्माण की प्रक्रिया: हर चरण का महत्व
    • कहानी और पटकथा लेखन
    • दृश्य निर्देशन और सिनेमैटोग्राफ़ी
    • संगीत और मूड का निर्माण
    • भावना और यथार्थवाद
  3. समय के साथ बदलती कहानी
    • स्वर्णिम और शोमैन युग: राज कपूर और बिमल रॉय
    • रोमांस और कमर्शियल युग: यश चोपड़ा और सुभाष घई
    • आधुनिक युग: अनुराग कश्यप और नई सिनेमा
  4. महान फ़िल्मकार की पहचान
  5. तकनीकी और कलात्मक परिवर्तन

I. Introduction to Filmmaking

किसी कागज़ के सफ़ेद वर्क़ पर जब काली स्याही से कुछ लफ़्ज़ उतरते हैंतो वो महज़ शब्द नहीं होते - वो एक ख्वाब की पहली धड़कन होती है। फिर ये ख्वाब धीरे धीरे अपने पंख फैलाता हैरोशनी और परछाइयों में नहाता हैसंगीत की लहरों पर सवार होता हैऔर आख़िर एक रोज़ परदे पर उतर आता है - पूरी शिद्दतपूरी आब-ओ-ताब के साथ।

फिल्म बनाना ठीक उसी तरह की प्रक्रिया है जैसे हम किसी सुंदर भवन का निर्माण करते हैं। भवन के निर्माण में सबसे पहले ज़रूरत होती है मजबूत नींव कीवो foundation जिस पर पूरी इमारत खड़ी होगी। सिनेमा की दुनिया में ये नींव का काम एक अच्छी कहानी या script करती है। लेकिन सिर्फ़ नींव से तो कोई भवन खड़ा नहीं हो जाता। इस पूरे भवन का निर्माण कैसे होगाइसका architecture कैसा होगाइसका रंग-रोगनजगह का सुंदर सदुपयोगरोशनी और छाया का खेलहर कमरे की अपनी कहानी और पूरे महल की एक आत्मा - ये सारा निर्णय और इसका सुचारू रूप से क्रियान्वयन एक फिल्म निर्देशकएक filmmaker करता है।

यही है भारतीय सिनेमा का जादू - "स्क्रिप्ट से स्क्रीन तक का सफ़र" - जहाँ हर फ़नकार अपना अलग रंगअपना ख़ास लहज़ाअपनी मुख़्तलिफ़ निगाह लेकर आता है।

Bollywood filmmakers Sanjay Leela Bhansali, Rishikesh Mukharjee, Guru Dutt, Anurag Kashyap
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बॉलीवुड सिर्फ़ एक इंडस्ट्री नहीं - ये फ़नफ़लसफ़े और फ़राकत का संगम हैजहाँ हर निर्देशक अपनी दास्तान अपने अंदाज़ में सुनाता है। कोई गुरुदत्त की तरह परछाइयों में शायरी रचता हैतो कोई राज कपूर की तरह ग़रीब के ख्वाबों को सिल्वर स्क्रीन पर सजाता है। कोई ऋषिकेश मुखर्जी की तरह मध्यमवर्गीय ज़िंदगी की सादगी में ख़ूबसूरती ढूँढता हैतो कोई संजय लीला भंसाली की तरह हर फ़्रेम को पेंटिंग बना देता है।

इस ब्लॉग मेंहम भारत के सबसे प्रभावशाली फिल्मकारों की उस यात्रा को समझने की कोशिश करेंगेजहाँ पहले विचार से लेकर अंतिम फ्रेम तकवो कैसे सिनेमा की भाषा को गढ़ते हैंतोड़ते हैं और नए सिरे से परिभाषित करते हैं। कैसे एक स्क्रिप्टउनके हाथों में आकर एक ज़िंदासाँस लेती दुनिया बन जाती है।

इस कॉम्प्रिहेंसिव गाइड में हम उन महान फ़नकारों की बात करेंगे जिन्होंने भारतीय सिनेमा की ज़बान को नया मुहावरा दिया - पहले ख़याल से लेकर आख़िरी फ़्रेम तक।

II. Filmmaking का हुनर: हर चरण की कहानी

फ़िल्म बनाना महज़ कैमरे के पीछे खड़े होकर "एक्शन" बोल देना नहीं है। ये एक पूरा सफ़र है - जिसमें हर पड़ाव की अपनी अहमियत हैअपना हुनर हैअपनी आत्मा है।

Filmmakers Sanjay Leela Bhansal, Gulzar, Anurag, Guru Dut, blog in bollywood untold


1. कहानी और पटकथा: किस्सागोई का फ़न

ऋषिकेश मुखर्जी एक सलीक़ेमंद फिल्मकार थे जो किस्सागोई के उस्ताद भी थे, जानते है केसे वो किस्सागोई में कहानी को घडते थे.

जिसके हुनर को बिमल रॉय ने परखा और तराशा होउसका बेहतरीन होना लाज़िमी है। कोलकाता से एडिटिंग और सिनेमैटोग्राफ़ी का हुनर सीख कर आए ऋषिकेश मुखर्जीमुंबई में एक मुकम्मल सिनेमाई शख़्सियत बनने की कोशिश में लगे थे।

बिमल रॉय ने अपनी फ़िल्म "दो बीघा ज़मीन" के स्क्रीनप्ले और एडिटिंग की दोहरी ज़िम्मेदारी ऋषि दा को दे दी। सलीक़ामंद किस्सागोई के हिमायती ऋषि दाअब "देवदास" को अपनी पारखी नज़र से एडिट करते हैं।

पहली निर्देशित फ़िल्म "मुसाफ़िर" फ़्लॉप जरूर होती है लेकिन आम ज़िंदगी के अहम हिस्सों को परदे पर उतारने की कला राज कपूर को भा जाती है। ऋषिकेश निर्देशित "अनाड़ी" सुपरहिट होती है और राज कपूर-ऋषिकेश मुखर्जी की दोस्ती की दास्तान का आग़ाज़ हो जाता है।

राज कपूर बेहद बीमार होते हैं और अपने दोस्त को खो देने की घबराहट मेंऋषि दा "आनंद" लिखते हैं। फ़िल्म राजेश खन्ना की झोली में गिरती है और अमिताभ का चरित्र बाबूमोशायदरअसल राज कपूर द्वारा ऋषि दा को संबोधन होता है।

ऋषिकेश मुखर्जी की पूरी कहानी पढ़ें  CLICK HERE

 

गुलज़ार: गुलज़ार साब नज़्मों में कहानी पिरोने वाले शायर और बेहतेरीन फ़िल्मकार हैं

ये वो शख़्स हैं जिसे अपनी नज़्मों में कहानी पिरोने का हुनर आता है - वो फ़िल्म बनातें है तो लगता है कोई खूबसूरत सी लम्बी कविताअपने आग़ोश में चित्र और उनकी आवाज़ों को बांधकर बह रही है। वो नज़्म लिखतें है तो लगता है कि गर्म सहरा को शादाब करने कोई दरियाअपना हृदय जलाकर लोगों को शीतलता दे रहा है।

सिनेमा और साहित्य को अपना ख़ुदरंग लहज़ा देने वाले इस सफ़ेद पैरहन वाले संत का नाम गुलज़ार है।

Gulzar साहब ने हमेशा कहा है कि लिखना एक तरह से अपने भीतर की आवाज़ को सुनना है। उनकी फिल्मों में - चाहे वो मौसम  हो या इजाज़त - हर शब्दहर संवादभावनाओं की एक गहरी नदी की तरह बहता है। Script सिर्फ़ dialogues नहींबल्कि किरदारों की आत्मा होती है।

गुलज़ार की शायराना फिल्ममेकिंग का सफ़र  CLICK HERE

अनुराग कश्यप: यथार्थवादी कहानीकार

सत्तर का दशक अपनी राजनीतिक हलचलक्रांति के नए मसीहा जे पीअभिनय में अमिताभ के उदय की वजह से अलग से पहचाना जा रहा था। इसी दशक में पूरब के एक शहर की निचली परत धीरे धीरे सुलग रही थी। दो बाहुबलियों की अदावत ने शहर के मिज़ाज पर अंगारा रख छोड़ा था।

इसी शहर गोरखपुर में 1972 में 10 सितंबर को जब बारिश भी आग बुझाने में नाकाम होकर इस्तीफ़ा दे देती हैएक बच्चा भारतीय सिनेमा के चिर परिचित चेहरे को ख्वाब सरीखी खूबसूरती से निकाल कर खुरदुरे यथार्थ की मौलिक सुंदरता के साथ पेश करने की जुर्रत लिए पैदा होता है। इस बच्चे का नाम अनुराग कश्यप था। Anurag Kashyap की पटकथा  में एक अलग ही तेवर दिखता है। उनकी कहानियाँ गलियों से उठती हैंवहाँ की ज़ुबानवहाँ का दर्दवहाँ की हक़ीक़त लेकर आती हैं। Gangs of Wasseypur या Dev.D में script सिर्फ़ कहानी नहींबल्कि समाज का आईना बन जाती है।

अनुराग कश्यप की यथार्थवादी सिनेमा की यात्रा  CLICK HERE

2. दृश्य निर्देशन: रोशनी और परछाइयों की शायरी

गुरुदत्त: परछाइयों के शायर

ख्वाहिशें आँखों पर बैठती हैंधीरे धीरे आँखें उन्हें अंदर समेट लेती हैंफिर सीप के अंदर मोती की तरह ख्वाब पलने लगते हैं। ऐसे ही कुछ मोती सरीखे खूबसूरत और काँच की मानिंद नाज़ुक ख्वाब वसंत शिवशंकर पादुकोण ने देखे थे।

लगभग एक सदी पहले जब बादल आसमान से मिलने घुमड़ घुमड़ के आते हैं और ऐसे गले लगते हैं कि स्नेह की धारा बहने लगती हैइसी भीगी जुलाई में माँ के लिए ख़ुशियों का वसंत लाने वाले वसंत शिव शंकर पादुकोण जन्म लेते हैं।

बारिशों में जन्म लेने वाले पानी से नहीं डरते - एक शाम घुटनों से जहाँ नाप लेने का ख़याल लिए वसंत पास के कुएँ में गिर जाते हैं। घर के पंडित और गुरु जान बचाते हैं और नया नाम रखते हैं - गुरु... गुरुदत्त।

घुटनों से थिरकता अब गुरुदत्त दरिया के एक और शहर कोलकाता का हिस्सा हो जाता है। दरिया में जब लहर उठतीगुरुदत्त का बदन ऐंठने लगतालहर उतरती तो गुरुदत्त के पैर बदन से छलक कर थिरक उठते। अब गुरुदत्त को नृत्य का शौक़ लग गया था और जल्दी ही उनकी मुलाक़ात मशहूर नृत्य निर्देशक उदय शंकर से हुई।

मुंबई में देव आनंद से मुलाक़ात होती है। देव की नज़रें गुरुदत्त की मेघाजुनूनक़ाबिलियतअदाएगी और मुख़्तलिफ़ अंदाज़ भाँप लेती हैं। दो दोस्त एक नए सफ़र की बाज़ी खेलते हैं और ये "बाज़ी" उस दौर की बेहतरीन चाल होती है जो दोनों जीत जाते हैं।

इस फ़िल्म ने शैडो लाइटिंग और अमेरिकन नॉयर शृंखला में नए प्रतिमान स्थापित किए। गुरुदत्त सिर्फ़ अपनी बात कहना नहीं चाहते थेवो अपनी हर बात अपने अंदाज़ में रचना चाहते थे। Guru Dutt की फिल्मों में light और shadow का जो खेल दिखता हैवो poetry in motion है। प्यासा और कागज़ के फूल में हर frame एक पेंटिंग की तरह है। उनका कैमरा  किरदारों के चेहरे नहींउनकी रूह को कैद करता था।

गुरुदत्त के गीले मन की कच्ची मिट्टी पर कुछ निशान बनने लगे थे। ये निशान अपनी आवाज़ से रूह में उतरने वाली गीता रॉय के थे जो गुरुदत्त के हतप्रभ कर देने वाली प्रतिभा से मुतास्सिर होकर गीता दत्त हो गईं। लेकिन कलाकार दिल से बहुत प्यासा होता है - इस तलाश का ख़ात्मा वहीदा रहमान पर हुआ और "प्यासा" हिंदुस्तान के हर ज़हीन के खुश्क गले की ज़रूरत बन गई।

गुरुदत्त की विज़ुअल पोएट्री की पूरी दास्तान  CLICK HERE

संजय लीला भंसाली: फ़्रेम दर फ़्रेम पेंटिंग का मास्टर

भुलेश्वरमुंबई का एक सिमटा सा कमरा हर रोज़ रात में और सिमट जाता जब ज़िंदगी के अलग अलग मसाइल से हार करएक क़ाबिल शख़्स घर लौटता। जले ख्वाबदरक गई उम्मीदउसके पैरों में तमाम लग़्ज़िश भर देती। काँपते पाँव से घर लौटता ये शख़्स अपने दुधमुँहे ख्वाबअपने कच्चे से बच्चे की आँखों में पिरो देता।

इसी ख्वाब बोने के सफ़र में इस शख़्स ने अपने खिलौने खेलने की उम्र वाले बच्चे को 18 बार "मुग़ल-ए-आज़म" दिखाई। गुमसुम सा ये छोटा बच्चा जब इस ख्वाब को न समझ पातान संभाल पाता तो कोने में रो देता। यही नमकीन पानी इस ख्वाब को सींचने लगे और आज ये छोटातन्हाएक कमरे में सिमटा सा बच्चाहिंदुस्तान के बड़े ख्वाब सरीखे कैनवास का सबसे बड़ा मुसव्विर है।

दुनिया एहतराम से इस शख़्स को संजय लीला भंसाली के नाम से जानती है।

पिता नवीन भंसाली के रोपे गए ख्वाब के एक एक रंग को गाढ़ा करते संजयहिंदुस्तान के सबसे नामचीनक़ाबिल निर्देशक बन गए जिनकी फ़िल्मसिर्फ़ फ़िल्म नहीं - हज़ारों बेइंतिहा खूबसूरत पेंटिंग का सहेजा हुआ कोलाज़ होती है।

छोटे और बेतरतीब कमरे में रहने वाला संजय अब हर घर (सेट) को ख्वाब सरीखा सुंदर और बेहद विशाल बनाना चाहता था। बचपन के हर अभाव का बदला अब संजय अपनी फ़िल्म में ले रहे थे - बिना लड़ेबिना आवाज़ किए। उनका आक्रोश रोमांस की शक्ल में बिफर रहा था।

"हम दिल दे चुके सनम" में संजय ने फ़िल्म के एक एक फ़्रेम को पेंटिंग सरीखा बना दिया। गुजरात और राजस्थान के सहरा का उफनता लोक संगीत सहरा में इस क़दर गूँजने लगा कि रेत रेत खिलखिला उठी।

"देवदास" ने कामयाबी की नई इबारत लिख दी। "बाजीराव मस्तानी" मोहब्बत की आसमानी दास्तान बन गई। "पद्मावत" भले ही अलग अलग तरह के विवाद में रही लेकिन वीर रस के साथ शृंगार का ऐसा अद्भुत रंग बिखेरना महज़ कमाल हो सकता है।


3. संगीत और मूड: फ़िल्म की रूह

60 का दशक डूब रहा था। दशक के ख़त्म होने में एक आध साल बचे थे। मुंबई के पड़ोस के शहर पुणे के एफ़ टी आई से दो नौजवानअपने अपने ख्वाबों के दिए को रोशन करने के लिए अपनी अपनी रातें जला रहे थे।

इनमें से एक नौजवान को छोटे किरदारखल चरित्र करते हुए इन्हें एक आध नायक की भूमिका भी मिलती है लेकिन फ़िल्म की बॉक्स ऑफ़िस की खिड़की के बाहर ही साँसें उखड़ जाती हैं। आँखों में टूटते ख्वाबहौसला तोड़ देंइससे पहले दूसरा नौजवान हार रहे अभिनेता का हाथ पकड़ लेता है और दुनिया "कालीचरण" से वाक़िफ़ हो जाती है।

दोस्ती और कमिटमेंट के इस चेहरे और जज़्बात देने वाले नौजवान का नाम सुभाष घई था। नायक को अपनी गाढ़ी आवाज़ और कुछ हद तक कठोर चेहरा और जिस्म देने वाले नौजवान का नाम शत्रुघ्न सिन्हा था।

बेहद सज धज वाले खूबसूरत नायकों की परंपरा के विपरीतखासे सख्त चेहरे वाले शत्रुघ्न सिन्हा को नायक बनाने की सोच और उस पर अमल करने वाले सुभाष घईएक सामान्य निर्देशक नहीं हो सकते थे।

सुभाष घई को पत्थर तराशने का हुनर आता है। बहुत सारे अनगढ़बेडौल पत्थरों को अपने हुनरसोचक़ाबिलियत से सुभाष घई ने एक खूबसूरत मुजस्समा बनने का मौक़ा दिया।

पुनर्जन्म की एक कहानी के धागों मेंबेहद खूबसूरत संगीत गूँथतेसुभाष घई ने "क़र्ज़" बनाई तो पूरा देश मोंटी (ऋषि कपूर) पर फ़िदा होकर "ओम शांति ओम" करने लगा।

सुभाष घई की म्यूज़िकल स्टोरीटेलिंग  CLICK HERE

4. भावना और यथार्थवाद: दिल को छू जाने वाला सिनेमा

बारिशों के मौसमअक्सर तपती ज़मीन के हृदयस्थल को गीला करकेउनमें ज़िंदगी रोपने का काम करते हैं। ये मौसमहवाओं को नम करते हैं और बेहद कोमल और लताफ़त भरे लोगों के दिल की मिट्टी को भी ज़्यादा मुलायम कर देते हैं।

इन्हीं भीगे मौसम में ढाका में 12 जुलाई की मध्यम बारिश मेंएक बच्चा जन्म लेता है। बंगाल की साहित्यिकअभिजात्य ब्राह्मण ज़मींदार परिवार का ये बच्चा बचपन से ही अपनी नज़रों को बेहद पैनी करना सीख जाता है।

बड़े होने पर दुनिया को बेहद संवेदनशीलऔरतों के हक़ हक़ूक़ को शाइस्तगी से पेश करती फ़िल्में उपहार देने वाला ये बच्चाभारतीय सिनेमा के सबसे बड़े निर्देशकों में से एक बनता है। दुनिया इस शख़्स को बिमल रॉयप्यार और एहतराम से बिमल दा के नाम से जानती है।

बिमल रॉय की संवेदनशील सिनेमा की दुनिया  CLICK HERE

III. The Evolution of Bollywood Direction: समय के साथ बदलती कहानी

भारतीय सिनेमा का इतिहास directors के विकास की कहानी है। हर दौर में निर्देशकों ने अपने समय की आवाज़ को परदे पर उतारा।

The Golden Era & Showmanship: Raj Kapoor & Bimal Roy का दौर

Raj Kapoor ने अपनी फिल्मों में social romanticism की नींव रखी। AwaraShree 420Sangam - इन फिल्मों में एक तरफ समाज की विषमता थीतो दूसरी तरफ प्रेम और सपनों की मासूमियत। Raj Kapoor का tramp character - फटे कपड़ों में लेकिन बुलंद इरादों के साथ - आम आदमी का प्रतीक बन गया।

Bimal Roy ने parallel cinema की राह दिखाईजहाँ मनोरंजन के साथ-साथ social message भी ज़रूरी था। Do Bigha Zameen में किसान की त्रासदी को इतनी संवेदनशीलता से दिखाया गया कि ये फिल्म सिर्फ़ India में नहींबल्कि Cannes में भी सराही गई।

The Era of Romance and Experiment: Yash Chopra & Subhash Ghai का जादू

80s और 90s के दशक में Bollywood ने अपना स्वर्णिम दौर देखा। ये वो समय था जब निर्देशक सिर्फ़ filmmaker नहींबल्कि dream merchants बन गए।

Yash Chopra ने romance को एक नई ऊँचाई दी। Switzerland के snow-covered mountains, chiffon sarees, और eternal love - ये सब Yash Chopra के signature बन गए। SilsilaChandniDilwale Dulhania Le Jayenge - इन फिल्मों में प्रेम एक जश्न थाएक ख़ूबसूरत ख़्वाब था। Yash ji ने emotional opulence को mainstream बनाया।

Subhash Ghai ने grand storytelling को perfection तक पहुँचाया। उनकी फिल्में events थीं - KarmaRam LakhanKhalnayak - हर फिल्म में बड़े canvas पर painted कहानियाँ, memorable characters, और unforgettable music Ghai साहब ने prove किया कि commercial cinema भी meaningful हो सकती है।

The Modern Auteurs: Anurag Kashyap & Vishal Bhardwaj की नई सोच

2000 के बाद का दौर Indian cinema में एक बड़े बदलाव का समय रहा। अब कहानियाँ गलियों से आने लगींकिरदार real लगने लगे।

Anurag Kashyap ने mainstream formulae को तोड़ा। Black FridayGangs of WasseypurUgly - इन फिल्मों में वो India दिखा जो सुनहरे सपनों से परे था। Kashyap ने बताया कि हकीकत में भी powerful cinema हो सकती है।

Vishal Bhardwaj ने adaptation को एक art form बनाया। Shakespeare की timeless कहानियों को Indian context में लानाऔर वो भी इतनी authenticity के साथ - ये Vishal की genius है। Maqbool (Macbeth), Omkara (Othello), Haider (Hamlet) - हर फिल्म एक masterclass थी।

Cinematic Movements: Parallel, Commercial, और Post-2000 Realism

भारतीय सिनेमा में तीन बड़ी धाराएँ रही हैं:

Parallel Cinema - Satyajit Ray, Ritwik Ghatak, Shyam Benegal जैसे निर्देशकों ने realistic, art-house cinema बनाया जो festivals में जाता था, awards जीतता था।

Commercial Cinema - यहाँ entertainment paramount था। Manmohan Desai, Prakash Mehra ने masala entertainers बनाए जो आम आदमी जो थका हरा थिएटर में आता था उनके चहरे से जिदगी की ताकन और दर्द पोंछ कर मुस्कान चिपका देते थे.

Post-2000 Realism - नई पीढ़ी के filmmakers ने दोनों को मिलाया। Entertainment भी, substance भी। Dibakar Banerjee, Abhishek Chaubey, Anubhav Sinha जैसे directors ने साबित किया कि realistic cinema भी commercially successful हो सकती है। सिनेमा की दोनों धाराओं कमर्शियल और पैरेलल सिमेना को एक माला में गूँथ कर उसे दोनों तरह के दर्शकों के लिए ग्राह्य बना दिया इस तरह के सिनेमा ने विशेष विषय पर बनी आर्टिस्टिक फिल्म को कमर्शियल सिनेमा का बिकने वाला प्रोडक्ट भी बना दिया.

IV. महान फ़िल्मकार की पहचान: उनका विज़न और फिलोसफी

हर महान निर्देशक का अपना एक vision होता हैएक unique voice जो उनकी हर फिल्म में गूँजती रहती है। कुछ निर्देशक प्रेम को समाज के आईने में देखते हैंतो कुछ हकीकत की कठोर ज़मीन पर उतार लाते हैं। एक लेखक की भांति अपने खास कुद्रंग अंदाज़ में इन महँ फिल्म्म्कारों ने सिनेमा को मनोरंजन के खांचे से निकल कर कला का एक बेजोड़ नमूना बना दिया. इन्ही बेजोड़ फिल्म्म्कारों की बेजोड़ कृतियों पर एक खास नज़र...

Raj Kapoor की Social Romanticism बनाम Anurag Kashyap की Raw Realism

Raj Kapoor का सिनेमा सपनों और हकीकत के बीच एक सुंदर पुल था। उनकी फिल्मों में नायक भले ही गरीब होता थाफटेहाल होता थालेकिन उसका दिल राजा से बड़ा होता था। आवर में Raj जी ने दिखाया कि परिस्थितियाँ इंसान को अपराधी बना सकती हैंलेकिन प्रेम उसे फिर से इंसान बना सकता है। उनका camera हमेशा आशा की किरण ढूँढता रहता थाचाहे अँधेरा कितना भी घना क्यों न हो।

दूसरी तरफ Anurag Kashyap  का सिनेमा हमे खुबसूरत सपनो में अपने ग़मों को खोने का अहसासनहीं देता बल्कि यथार्थ के कठोर हतोड़े से हमारे सिने और ज़ेहन दोनों पर लगातार प्रहार करता है. ये सच का सिनेमा हमे विचलित करता है, बेचेन करता है और सच से मुह मोड़ने के बजाये यथाथ की आँखों में आँख डालने में मजबूर करता है.

राज कपूर ने नेहरु के सोशल romantisum को सिनेमा का चेरा पहनाया वही अनुराग कश्यप क्रुद रेअलिस्म को परदे पे उतर ले आये.

Yash Chopra का Emotional Opulence बनाम Hrishikesh Mukherjee की Minimalism

Yash Chopra  के सिनेमा में हर भावना बड़ी थीहर emotion को grandeur के साथ celebrate किया जाता था। जब Silsila में Amitabh और Rekha प्रेम करते हैंतो पूरी कायनात उनके साथ झूमती है। Switzerland के पहाड़, endless fields of flowers, और वो iconic white चादर - ये सब emotions को larger than life बनाते थे। Yash ji मानते थे कि प्रेम एक celebration हैइसे भव्यता से दिखाना चाहिए।

Hrishikesh Mukherjee का approach बिल्कुल उलट था। उनकी फिल्मों में कोई Switzerland नहीं थाकोई designer costumes नहीं थे। Anand में जब Rajesh Khanna मरता हैतो कोई melodrama नहीं होता। Simple room, simple लोगऔर life के simple truth Hrishi da कहते थे - "Life is simple, why complicate it?" उनकी minimalism में एक गहरी ताकत थीक्योंकि उसमें हर कोई अपनी ज़िंदगी देख लेता था।

दोनों styles सही हैंदोनों powerful हैं। एक ने भावनाओं को महल में रखादूसरे ने घर की चौखट पर।

अलग-अलग आवाज़ेंएक ही मंज़िल

चाहे Guru Dutt की poetic melancholy हो या Subhash Ghai का commercial grandeur, Gulzar की lyrical sensitivity हो या Vishal Bhardwaj की dark intensity - हर filmmaker अपनी unique voice के साथ आया और Indian cinema को समृद्ध किया।

एक महान निर्देशक वो है जो सिर्फ़ कहानियाँ नहीं बनाताबल्कि एक पूरी दुनिया रचता है - जहाँ हर frame उसकी सोच को reflect करेहर dialogue उसकी philosophy को echo करे।

V. The Technological and Artistic Transformation: तकनीक और कला का विकास

सिनेमा हमेशा से technology की बेटी रही है। जैसे-जैसे तकनीक बदली, filmmaking के तरीके बदलेऔर निर्देशकों ने नए औज़ारों से अपनी कला को नए आयाम दिए।

Film Reels से Digital Cinema तक का सफर

पुराने ज़माने में फिल्म बनाना एक जटिल और महंगा काम था। हर shot की planning perfect होनी चाहिए थी क्योंकि film eel महंगी होती थी। Satyajit Ray और Guru Dutt के दौर में हर frame precious थाहर take सोच-समझकर लिया जाता था। उस दौर के filmmakers के पास technical limitations थींलेकिन उन्होंने creativity से उन limitations को strength बना दिया।

Ritwik Ghatak ने बिना किसी modern technology के Meghe Dhaka Tara में ऐसे visuals create किए जो आज भी haunting लगते हैं। Sound design में उन्होंने experimentation किया जो उस दौर में revolutionary था।

90s में technology थोड़ी accessible होने लगीलेकिन असली क्रांति 2000s में आई। Digital cinema ने filmmaking को democratize कर दिया। अब छोटे budget में भी quality films बन सकती थीं। Anurag Kashyap ने इसका पूरा फायदा उठाया - Black Friday को वो traditional studio system के बाहर जाकर बना सके।

आज के directors के पास CGI है, digital color grading है, drone cameras हैं। S.S. Rajamouli ने Baahubali में technology का ऐसा इस्तेमाल किया कि Indian cinema की global image बदल गई। लेकिन technology तो सिर्फ़ tool है - असली magic तो director की vision में होता है।

OTT Revolution: कहानी कहने के नए मंच

बड़े परदे से सिमट कर ६ इंच के मोबाइल में कहियां शुरुवात में बौनी प्रतीत होने लेगी, लेकिन शीघ्र हे बेशुमार नए कांसेप्ट और उनकाही कहैन्यों ने ओवर थे टॉप माध्यम को बेहद इफेक्टिव बना दिया. अब directors को सिर्फ़ 2-3 घंटे नहींबल्कि 8-10 घंटे की कहानियाँ बताने का मौका मिला। Characters को develop करने का time मिला, nuances explore करने का space मिला।

Zoya Akhtar ने Made in Heaven से दिखाया कि OTT पर complex, layered storytelling कैसे की जा सकती है। Vikramaditya Motwane ने Sacred Games में cinematic grandeur को web series format में successfully translate किया।

OTT ने नए तरह की कहानियाँ भी possible बनाईं - वो कहानियाँ जो mainstream cinema में box office के डर से नहीं बन पातीं। Anubhav Sinha ने Anek जैसी politically charged films बनाईं, Abhishek Chaubey ने Paatal Lok में dark India को explore किया।

परंपरा और प्रयोग का संगम

आज का Indian cinema एक interesting phase में है। एक तरफ Sanjay Leela Bhansali जैसे directors हैं जो grand, opulent storytelling को ज़िंदा रखे हुए हैं - PadmaavatGangubai Kathiawadi में उनका vision पूरी तरह classical है लेकिन execution modern

दूसरी तरफ Vetrimaaran, Lokesh Kanagaraj, Shoojit Sircar जैसे filmmakers हैं जो नए territories explore कर रहे हैं - Piku में Shoojit ने father-daughter relationship को इतनी beautifully explore कियाबिना कोई melodrama किए।

ये सब अलग-अलग voices हैंलेकिन सबकी जड़ें उन महान filmmakers में हैं जिन्होंने पहले राह दिखाई थी।

 © अविनाश त्रिपाठी Official Website LinkIMDb , Animesh Films

 

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